Poems in Hindi by Saurabh

कविता अपने मन के भावों को प्रकट करने की सबसे उत्तम प्रक्रिया है. व्यक्ति अपने मन के भावों को स्पस्ट रूप से प्रस्तुत कर सकता है. यह अपने अनुभवों को शब्दों में पिरो कर कविता में ढाल देता है. कवी सदैव ही अपने आस पास में घटित तथा काल्पनिक घटनाओ, मनोस्थिति को अपनी भाषा में व्यक्त करता है. कविता क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव को एक नयी दिशा प्रदान करता है. कविता स्वयं में ही विषयवास्तु का व्याख्यान है. कविता सुनते या सुनाते समय विषय मनो आकरपूर्ण प्रतीत होता है. सुननेवाले को वह दृश्य स्पस्ट दिखाई देने लगता है.

स्वागत नववर्ष का 

आओ हम सब मिलकर करे
स्वागत नववर्ष का
नयी उमंगें ,नयी तरंगे
और नवीन हर्ष का.

मिले तुम्हे एक नयी दिशा,
हो हर राह तुम्हारी प्रकाशमय.
छट जाये दुःख के बादल
हो हर दिन तुम्हारा आनंदमय.

कल होगा एक नया प्रभात,
जीवनज्योति से जगमग होगी रात.
हर दिन हो खुशियों की बरात,
महकते रहे फूलों से दिन रात.

पूरी हो जाएं वह सभी ,
जो भी तुम्हारी कामनाएं हैं.
इस नव वर्ष पर मेरी,
यही शुभकामनाये हैं .

आज की राजनीती…
आ गया है सर पे चुनाव,
कोई ऐसी राह बताओ.
जीत जाएं हम ये एलेक्सन,
फिर न होगा कोईटेंशन.
सारी जनता को फुसलाओ,
सारे वोट हमें दिलवाओ.
फिर चाहे जितना नोटकमाओ,
खाओ, पियो औरमौज़ उड़ाओ.
अब जनता से हमे क्या लेना,
है बस उन्हें दिलासा देना.
जनता सेवा का था वादा,
परअब नहीं कोई ऐसा इरादा.
हम चाहतें है बस इतना,
हित करते रहे बस अपना.
यही तो है आज की नीति,
लोग कहतें है इससे राजनीती.
देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है.
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है…
चुनाव मे सैकड़ों वादे करतें हैं.
और फिर उन्ही के राज मे बच्चे भूख से मरते हैं…
जबकि देश के अनाज गोदमो मे सड़ते…
और कुछ धन्ना सेठ अपनी तिज़ोरी भारतें हैं…
पता नही हमे कैसे ये सब सहन हो गया है…
देश मे रोटी का भी विमुद्रीकरण हो गया है…?
देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है…
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है…
देश के लिए जो सैनिक मरते हैं.
उनके परिवारजन सरकारी अनुकंपा को तरसते हैं.
हर रोज़ सभी से गुहार करते हैं.
लेकिन सरकारी तन्त्र अपनी मनमानी करते है.
वीरो के सम्मान का भी हनन हो गया है,
सरकारी व्यवस्था मे कैसा अनियंत्रण हो गया है…?
देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है…
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है…
जिस देश मे देवी की पूजा और सम्मान करते हैं.
वहीं लोग महिलाओं का नीचा मान करते हैं.
शायद उनकी तरक्की देख जलते हैं.
इसी वजह से मन मे इतना भेद रखते हैं…
ना जाने क्यूँ लोगो का इतना मैला मन हो गया है…
मानो मानवता का भी चीरहरण हो गया है…
देश मे कुछ ऐसा चलन हो गया है…
की, मां के आँसूओ का भी राजनीतिकरण हो गया है...